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हिंदी न्यूज़ – …जब यूपी के सियासी मैदान में प्रशांत किशोर की रणनीति हो गई थी तार-तार_When Prashant Kishore fails in UP Assembly Elections


देश के प्रमुख सियासी रणनीतिकार प्रशांत किशोर (पीके) ने जनता दल यूनाइटेड की सदस्यता ले ली है. खुद जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष और बिहार के सीएम नीतीश कुमार ने प्रशांत किशोर को पार्टी की सदस्यता दिलाई. पटना के सत्ता के गलियारे में चर्चा है कि पीके भविष्य में नीतीश कुमार के उत्तराधिकारी भी हो सकते हैं. बहरहाल, उत्तर प्रदेश में भी पीके के राजनीति में सीधे प्रवेश की खबरों पर चर्चाओं का बाजार गर्म है.

दरअसल सियासी रणनीतिकार के तौर पर प्रशांत किशोर का उत्तर प्रदेश से भी कुछ महीनों का नाता रहा. वह यहां 2017 के विधानसभा चुनावों के दौरान कांग्रेस पार्टी की तरफ से मैदान में उतरे थे. लेकिन मोदी और नीतीश जैसे दिग्गजों को सत्ता की सीढ़ियां चढ़ाने वाले इस मैनेजमेंट गुरू को यूपी से निराशा ही हाथ लगी.

दरअसल प्रशांत किशोर ने साल 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के लिए कैंपेन की. मोदी प्रधानमंत्री बनने के बाद प्रशांत किशोर धीरे-धीरे बीजेपी से दूर हो गए. इसके बाद उन्होंने बिहार का रुख किया और बिहार विधानसभा चुनाव में बीजेपी के खिलाफ नीतीश कुमार के लिए कैंपेन किया. नीतीश की जेडीयू और लालू की आरजेडी व कांग्रेस को साथ लाकर महागठबंधन बनाने के पीछे भी प्रशांत किशोर का ही दिमाग माना जाता है. इस महागठबंधन में बिहार चुनाव में बीजेपी को सीधी मात दी और नीतीश के साथ ही पीके की प्रोफाइल में भी तगड़ी उछाल देखने को मिली.

इसके बाद राहुल गांधी ने कांग्रेस के लिए रणनीति बनाने के लिए पीके की सेवा ली. 2017 में यूपी विधानसभा चुनाव में पीके ने 27 साल यूपी बेहाल का नारा दिया. राहुल गांधी ने प्रदेश भर में खाट सभा का आयोजन किया. इसके बाद सपा से गठबंधन की रूपरेखा तैयार करने में भी पीके की रणनीति को ही आधार माना गया. लेकिन चुनाव के परवान चढ़ते-चढ़ते पीके धीरे-धीरे कहीं गुम होते गए. खबरें आने लगीं कि उनकी रणनीति से कांग्रेस ज्यादा संतुष्ट नहीं है, वहीं कांग्रेस नेताओं की तरफ से भी पीके की टीम को वह समर्थन नहीं मिला, जो उन्हें बिहार में महागठबंधन या 2014 लोकसभा चुनाव में बीजेपी से मिला.बहरहाल, चुनाव में बीजेपी ने पूर्ण बहुमत हासिल किया, वहीं सपा और कांग्रेस के बीच गठबंधन पूरी तरह धराशायी हो गया.  सियासी जानकारों में यूपी में सपा और कांग्रेस के बीच गठबंधन को बड़ी भूल करार दिया. यहां तक कहा गया कि कांग्रेस अगर अकेले चुनाव लड़ती तो बेहतर प्रदर्शन कर सकती थी.
यूपी चुनाव के बाद से पीके की साख को तगड़ा झटका लगा, कभी उन्हें चुनाव में जीत की गारंटी माना जाने लगा था. लेकिन यूपी के बाद इस पहचान को धक्का लगा.

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