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Wednesday, October 10, 2018

हिंदी न्यूज़ – Madhya Pradesh election 2018: political situation and caste equation of Vindhya 30 assembly seats Rewa and Satna


मध्य प्रदेश का विंध्य जिसे बघेलखंड के नाम से भी जाना जाता है, देश का शायद इकलौता ऐसा इलाका है जहां कुल आबादी का सबसे बड़ा हिस्सा सवर्ण जातियां हैं. इस इलाके के सतना और रीवा जिले की कुछ विधानसभा सीटों पर तो सिर्फ ब्राह्मणों की आबादी 40% भी पार कर जाती है. रीवा के ‘सफ़ेद शेर’ के नाम से मशहूर कांग्रेसी नेता श्रीनिवास तिवारी यहां के सबसे बड़े ब्राह्मण लीडर माने जाते थे.

सवर्ण आंदोलन का असर मध्य प्रदेश के किसी इलाके पर अगर सबसे ज्यादा देखा जा सकता है तो यही वो इलाका है जहां बीजेपी को सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ सकता है. सीएम शिवराज का ‘माई के लाल’ वाला बयान यहां उनके गले की फांस बनता नज़र आ रहा है. विंध्य की ज्यादातर सीटों पर बसपा भी काफी मजबूत नज़र आती है और बीते छह विधानसभा चुनावों में जिन 24 सीटों पर बसपा जीती है उनमें 10 इसी इलाके की सीटें- चित्रकूट, रैगांव, रामपुर बघेलन, सिरमौर, त्योंथर, मऊगंज, देवतालाब, मनगवां, गुढ़ थीं.

सतना दौरे पर आए राहुल गांधी भी यहां सवर्ण आंदोलन के प्रतिनिधियों से मुलाक़ात की थी. हालांकि सपाक्स के आंदोलन को करीब से देखने पर पता चलता है कि उसी लीडरशिप आरएसएस जैसे संगठनों के लोग ही चला रहे हैं और उसके चुनाव लड़ने से नुकसान कांग्रेस को ही होने जा रहा है. इसके अलावा बीजेपी इससे भी आश्वस्त है कि बसपा के अलग लड़ने का नुकसान भी कांग्रेस को ही होगा ऐसे में उसका फोकस बस इस पर है कि उससे नाराज़ सवर्ण वोटबैंक बस कांग्रेस को शिफ्ट न हो.

सतना में सवर्ण आंदोलनविंध्य के सात जिलों में कुल 30 विधानसभा सीटें हैं जिनमें से 17 बीजेपी, 11 कांग्रेस और 2 बीएसपी के पास हैं. इस इलाके को जातियों की आबादी के नज़रिए से देखा जाए तो यहां 29% सवर्ण, 14% ओबीसी, 33% एससी/एसटी और 24% अन्य की हिस्सेदारी है. बता दें कि एमपी की राजनीति पर एक समय ब्राह्मणों का वर्चस्व हुआ करता था हालांकि आज उनकी संख्या और रसूख़ दोनों पहले जैसे नहीं रहे. नवंबर 1956 में मध्य प्रदेश राज्य के गठन के बाद साल 1990 तक पांच ब्राह्मण मुख्यमंत्रियों ने करीब 20 वसालों तक यहां राज किया है.

क्या कहती हैं ये 30 सीटें: 

सतना
सतना में कुल 7 सीटें हैं और 2013 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने इसमें से पांच सीटें जीतकर सबको चौंका दिया था. हालांकि उपचुनावों में मैहर सीट बीजेपी ने जीत ली और इसके पीछे वजह बताई जाती है बीएसपी का अलग चुनाव लड़ना. सतना की सभी सीटों पर ब्राह्मण आबादी सबसे ज्यादा है. ब्राह्मणों के आलावा इस इलाके में ठाकुर, कुशवाहा, पटेल, एससी और कोल प्रमुख जातियां हैं. इनके आलावा मुस्लिम और आदिवासी भी प्रभावी वोटबैंक हैं. चित्रकूट विधानसभा सीट पर नंवबर 2017 में हुए उपचुनावों में कांग्रेस ने बीजेपी के उम्मीदवार शंकर दयाल त्रिपाठी को हराकर फिर कब्ज़ा किया था. साल 2008 में यहां से कांग्रेस को सिर्फ 700 वोटों से हार का सामना करना पड़ा था. बसपा ने चित्रकूट सीट से रावेंद्र पटवारी को मैदान में उतारा है.

रैगांव आरक्षित सीट है और यहां पर एससी की बागरी जाति सबसे प्रभावशाली मानी जाती है. यहां से बसपा की उषा चौधरी विधायक हैं. हालांकि बीजेपी भी यहां काफी मजबूत है और 2008 में ये सीट उसी के जुगल किशोर ने जीती थी. बागरी जाति भले ही एससी कैटेगरी में आती हो लेकिन इस इलाके के बड़े ज़मीदारों में ये शामिल हैं. सतना सीट बीजेपी का गढ़ मानी जाती है और पिछली तीन बार से यहां शंकरलाल तिवारी ही जीत रहे हैं. हालांकि इस बार बीजेपी से ये टिकट ब्राह्मण की जगह ओबीसी या ठाकुर को भी दिया जा सकता है. ताम्रकार सिंह और सांसद गणेश सिंह का नाम भी दावेदारों की लिस्ट में है. कांग्रेस एक बार फिर गगनेन्द्र को मैदान में उतारने जा रही है. उधर इस सीट पर बसपा ने बीजेपी के पूर्व महापौर रहे पुष्कर सिंह तोमर को टिकट देकर मामला त्रिकोणीय कर दिया है. 2013 के विधानसभा चुनाव में सतना सीट पर लड़ाई दो ब्राह्मणों के बीच थी. बीजेपी की ओर से शंकरलाल तिवारी तो कांग्रेस की ओर से राजाराम त्रिपाठी मैदान में थे. सवर्णों की लड़ाई से बीएसपी को फायदा पहुंचा और पिछले चुनाव में मायावती की पार्टी को भी 21 फीसदी वोट मिले थे.

नागौद में ठाकुरों का दबदबा माना जाता है और ये सीट फिलहाल कांग्रेस के यादवेंद्र सिंह के पास है. 2013 से पहले लगातार दो बार ये सीट बीजेपी के पास ही थी. इस सीट पर भी ब्राह्मण आबादी सबसे ज्यादा है और बीजेपी उसी पर दांव खेलती है. मैहर सीट बीजेपी ने उपचुनावों में जीती थी. इलाके के लोगों की माने तो बीजेपी विधायक नारायण त्रिपाठी ने इलाके में काफी काम कराया है. नारायण पहले कांग्रेस और सपा के टिकट पर भी चुनाव लड़कर जीत चुके हैं. उपचुनावों में कांग्रेस का दामन छोड़ त्रिपाठी ने बीजेपी से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की. इस इलाके में ब्राह्मण और पटेल आबादी ज्यादा होने की वजह से ब्राह्मण निर्णायक साबित होते हैं. हालांकि बीएसपी को भी यहां करीब 27 फीसद वोट हासिल हुए थे.

अमरपाटन की बात करें तो यहां से राजेंद्र सिंह विधायक हैं जो कि नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ‘राहुल’ के मामा हैं. कांग्रेस सूत्रों के मुताबिक इन दोनों के बीच बिलकुल भी नहीं बनती और इसी के चलते इस बार कांग्रेस का यहां से जीतना मुश्किल नज़र आ रहा है. ऐसा बताया जाता है कि अजय नहीं चाहते कि इस इलाके में उनके कद का कोई और नेता पैदा हो सके. गौरतलब है कि अमरपाटन लोकसभा पर भी बीजेपी का ही कब्ज़ा है और इलाके के लोगों का कहना है कि ये अजय सिंह की मदद के बिना संभव ही नहीं था. रामपुर बाघेलान कांग्रेस का गढ़ मानी जाती है और यहीं से पूर्व सीएम गोविन्द नारायण सिंह भी चुनाव लड़ते थे. हालांकि अब यहां गोविन्द के बेटे हर्ष नारायण बीजेपी से विधयाक हैं. हर्ष सिंह पिछली चार बार से ये सीट जीत रहे हैं और इस बार भी वो काफी मजबूत उमीदवार नज़र आ रहे हैं. यहां कांग्रेस नहीं बल्कि बसपा दूसरे नंबर पर रहती है, हर्ष ने भी 2013 में बीएसपी के रामलखन सिंह को हराया था.

रीवा
रीवा जिले में कुल 8 विधानसभा सीटें हैं जिनमें से 5 बीजेपी, 2 कांग्रेस और 1 बीएसपी के पास है. 28 सितंबर को राहुल गांधी ने रीवा राजघराने के महाराज मार्तंड सिंह के बेटे पुष्पराज सिंह को कांग्रेस जॉइन करवाकर इलाके की राजनीति के समीकरण बदलने के संकेत दे दिए हैं. बता दें कि पुष्पराज सिंह के बेटे दिव्यराज सिंह फिलहाल सिरमौर सीट से बीजेपी के विधायक है. दिव्यराज सिंह के भी कांग्रेस में जाने की अफवाहों के बीच बीजेपी यहां फंसती नज़र आ रही है. बता दें कि 2008 में ये सीट बीएसपी के खाते में गई थी और रामकुमार उरमलिया ने बीजेपी को तीसरे नंबर पर पहुंचा दिया था.

श्रीनिवास तिवारी के साथ ज्योतिरादित्य सिंधिया (फ़ाइल फोटो)

सेमरिया फिलहाल बीजेपी के पास है और नीलम मिश्रा यहां से विधायक हैं. इस सीट पर भी बीजेपी की मुश्किलें बढ़ गई हैं क्योंकि नीलम के पति अभय मिश्रा ने कांग्रेस जॉइन कर ली है और ने बीजेपी के टिकट से लड़ने से मना कर दिया है. इस सीट पर भी बीएसपी काफी मजबूत है और उसके प्रत्याशी पंकज सिंह ही 2013 में यहां से हारे थे. 2008 के चुनावों में भी बीएसपी के लालमणि पांडे यहां दूसरे नंबर पर रहे थे. त्यौंथर सीट पर ब्राह्मण और आदिवासी आबादी सबसे ज्यादा है लेकिन कुर्मी और क्षत्रिय वोट बैंक भी यहां नतीजों को प्रभावित करता है. यहां से फिलहाल बीजेपी के रमाकांत तिवारी विधायक है जिन्होंने 2013 में कांग्रेस के रमाशंकर सिंह को हराया था. बीएसपी इस सीट पर भी काफी प्रभावी है और 2008 में सीट बीएसपी के ही राम गरीब ने जीती थी. इस सीट पर इस बार भी मुकाबला त्रिकोणीय रहने के आसार हैं.

रीवा में राहुल गांधी

मऊगंज कांग्रेस की परंपरागत सीट मानी जाती है और सुखेंद्र सिंह बन्ना यहां से विधायक हैं. साल 2008 में यहां उमा भारती की जनशक्ति पार्टी के लक्ष्मण तिवारी ने जीत हासिल की थी और बीजेपी को तीसरे पायदान पर धकेल दिया था हालांकि लक्ष्मण 2013 में बीजेपी लौट आए लेकिन कांग्रेस ने जीत हासिल की. बीएसपी 2008 में यहां दूसरे पर रही थी जबकि 2013 में भी 18 प्रतिशत वोटों के साथ तीसरे पर थी. देवतालाब सीट से फिलहाल बीजेपी के गिरीश गौतम विधायक हैं. गिरीश गौतम पहले लेफ्ट पॉलिटिक्स से संबंध रखते थे और बाद में बीजेपी में आ गए. इस सीट पर ब्राह्मण सबसे ज्यादा हैं लेकिन ओबीसी और एससी आबादी भी निर्णायक साबित होती हैं. यहां मुकाबला बीजेपी और बीएसपी के बीच होता है और कांग्रेस तीसरे नंबर की पार्टी है. एससी/एसटी भारत बंद के बाद यहां बीएसपी को काफी मजबूत माना जा रहा है. मनगवां आरक्षित सीट है और यहां से बसपा की शीला त्यागी विधायक हैं. हालांकि 2013 के चुनावों में बीजेपी ने यहां बीएसपी को कड़ी टक्कर दी थी और बीजेपी उम्मीदवार पन्नाबाई प्रजापति सिर्फ 275 वोटों से ही हारी थीं.

बीएसपी की रैली (फ़ाइल फोटो)

रीवा सीट से राज्य सरकार में उद्योग मंत्री राजेंद्र शुक्ल विधायक हैं और इस बार भी उन्हीं को टिकट मिलना तय माना जा रहा है. कांग्रेस की तरफ से अभय मिश्रा सबसे मजबूती से दावेदारी जाता रहे हैं हालांकि राजेंद्र शर्मा और राजा पुष्पराज सिंह को भी यहां से मैदान में उतारा जा सकता है. हालांकि 2013 में भी यहां दूसरे नंबर पर बीएसपी के कृष्ण कुमार गुप्ता रहे थे. इस सीट पर भी सबसे ज्यादा ब्राह्मण आबादी है और सवर्ण आंदोलन का भी यहां ख़ासा प्रभाव देखा जा रहा है. रीवा जिले की आठवी सीट गुढ़ से फिलहाल कांग्रेस के सुंदरलाल तिवारी विधयाक हैं. इस सीट पर भी सवर्ण आंदलन काफी उग्र था और इसके चलते बीएसपी को फायदा होता नज़र आ रहा है.

सीधी
यहां चार विधानसभा सीटें हैं जिनमें से दो बीजेपी और दो कांग्रेस के पास है. चुरहट की बात करें तो ये कांग्रेस के दिग्गज नेता अर्जुन सिंह की सीट रही है. फिलहाल यहां से राज्य के नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ‘राहुल’ विधायक हैं. इस सीट पर ब्राह्मण सबसे ज्यादा है लेकिन पटेल, कुशवाहा और एससी वोट भी काफी हैं. बीजेपी का कोर वोट बैंक ब्राह्मण-गुप्ता काफी नाराज़ चल रहे हैं. यहीं सीएम शिवराज पर एक सभा के दौरान पत्थर, चप्पल और चूड़ियां फेंकी गई थी. सतेंद्र तिवारी इस बार भी यहां से बीजेपी के उम्मेदवार हो सकते हैं.

अजय सिंह 'राहुल' (फ़ाइल फोटो)

सीधी सीट की बात करें तो यहां से बीजेपी के केदारनाथ शुक्ल पिछली तीन बार से विधायक हैं. इससे पहले तीन बार लगातार कांग्रेस के कमलेश्वर द्विवेदी रहे थे. इस सीट पर भी ब्राह्मण सबसे ज्यादा हैं लेकिन चौहान राजपूत और गोंड आदिवासी भी काफी संख्या में हैं. सिहावल सीट कांग्रेस के पास है और इलाके के कद्द्वर कांग्रेसी नेता इंद्रजीत कुमार पटेल के बेटे कमलेश्वर पटेल यहां से विधायक हैं. इस सीट पर पटेल ही सबसे ज्यादा हैं जो कांग्रेस के परंपरागत वोटर्स माने जाते हैं. धौहानी आरक्षित सीट है और यहां से बीजेपी के कुंवर  सिंह टेकाम विधायक हैं. इलाके के पत्रकार स्तुति मिश्रा बताते हैं कि टेकाम को लेकर लोगों में काफी नाराजगी है जिसका फायदा कांग्रेस को मिल सकता है. ये आदिवासी बहुल सीट है और सवर्ण आंदोलन से एसटी वोट कांग्रेस के पक्ष में एक हो सकता है.

सिंगरौली और शहडोल
पहले सिंगरौली की बात करें तो यहां तीन सीटें हैं जिनमें से दो बीजेपी और एक कांग्रेस के पास है. चितरंगी आरक्षित सीट है और यहां से कांग्रेस की सरस्वती सिंह विधयाक हैं. स्थानीय लोगों के मुताबिक आदिवासी बहुल इस इलाके में एक वक़्त पर ठाकुर और ब्राह्मण जातियों का आतंक था और इस से परेशान होकर बाकी जातियां एक तरफ़ा वोटिंग करती हैं. सिंगरौली शहर सीट से बीजेपी के राम लल्लू वैश्य विधायक हैं और यहां सवर्ण आंदोलन के दौरान पूरा बाज़ार बंद रहा था. देवसर सीट आरक्षित है और यहां से बीजेपी के राजेंद्र मेश्राम विधायक हैं. इस इलाके में भी एससी/एसटी भारत बंद और सवर्ण आंदोलन काफी प्रभावी नज़र आ रहा है.

शहडोल जिले में भी तीन तीन विधानसभा सीटें हैं. यहां तीनों सीटें ही आरक्षित हैं जिनमें से दो बीजेपी और एक कांग्रेस के पास है. ब्योहारी सीट जो सीधी संसदीय क्षेत्र में आती है से कांग्रेस के रामपाल सिंह सांसद हैं. ये इस जिले की सबसे हाईवोल्टेज पॉलिटिकल ड्रामा वाली सीट मानी जाती है. इस इलाके में ठाकुर जाति से आने वाले वीरेश सिंह रिंकू और लोकेश सिंह का वर्चस्व माना जाता है. ऐसा माना जाता है कि इनके समर्थन के बिना जीतना नामुमकिन है. पिछले चुनावों में भी बीजेपी ने इन दोनों के उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया था जिसके चलते बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा था. यहां बीजेपी के कट्टर समर्थक माना जाने वाला वैश्य समाज काफी नाराज़ है, जिसका फायदा कांग्रेस को ही मिलता नज़र आ रहा है.

सिंगरौली पावर प्लांट

जयसिंह नगर से बीजेपी की प्रमिला सिंह विधायक हैं. हालांकि उनकी स्थिति इस सीट पर काफी कमज़ोर बताई जाती है. यहां कांग्रेस से नरेंद्र सिंह और ध्यान सिंह मार्क को काफी मजबूत उम्मीदवार माना जा रहा है. नरेंद्र जिला पंचायत अध्यक्ष हैं और बीजेपी से बगावत कर दो महीने पहले ही कांग्रेस में आए हैं. जैतपुर से जयसिंह मरावी बीजेपी के विधायक हैं जो पहले मंत्री भी रह चुके हैं. मरावी दो बार से विधायक हैं और कोतमा से भी चुनकर विधानसभा पहुंच चुके हैं. बीजेपी में यहां जयसिंह के कद का कोई और नेता नहीं है जिसके चलते उनका टिकट ही पक्का माना जा रहा है. कांग्रेस में यहां उमा धुर्वे, ललन सिंह, यशोदा सिंह और हिमाद्री सिंह को सबसे मजबूत उम्मीदवार माना जा रहा है. हिमाद्री शहडोल लोकसभा सीट से भी चुनाव लड़ चुकी हैं.

अनूपपुर और उमरिया
अनुपूर जिले में तीन विधानसभा सीटें हैं जिनमें से दो कांग्रेस के पास जबकि एक पर बीजेपी का कब्ज़ा है. कोतमा से कांग्रेस के मनोज कुमार अग्रवाल विधायक हैं और यहां ब्राह्मण आबादी 35% से भी ज्यादा है. यहां से कांग्रेस व्यापारी को जबकि बीजेपी अक्सर ब्राह्मण को टिकट देती है. हालांकि ब्राह्मणों के खिलाफ बाकी जातियां कांग्रेस को फायदा पहुंचाती हैं. कांग्रेस से इस बार मनोज अग्रवाल के अलावा रामनरेश गर्ग और सुनील सराफ को भी मजबूत उम्मीदवार माना जा रहा है. बीजेपी से यहां अजय शुक्ला और लवकुश शुक्ला दावेदारी पेश कर सकते हैं. अनूपपुर और पुष्पराजगढ़ रिजर्व सीटें हैं. अनूपपुर से बीजेपी के रामलाल रौतेला विधायक है जिनके खिलाफ एंटीइन्कंबेसी का माहौल बताया जा रहा है. यहां से बीजेपी रामदास पुरी पर भी भरोसा दिखा सकती है जबकि कांग्रेस की तरफ से सहुलाल सिंह ही दोबारा मैदान में उतारे जा सकते हैं. पुष्पराज गढ़ से कांग्रेस के कुंदेलाल सिंह मार्को विधायक हैं और ये आदिवासी बहुल इलाका है. यहां सवर्ण या एससी/एसटी भारत बंद का कोई असर नहीं रहा था. बीजेपी यहां से सुदामा सिंह या रूपमति सिंह को टिकट दे सकती है.

उमरिया जिले में बांधवगढ़ और मानपुर दो विधानसभा सीटें हैं, और दोनों ही फिलहाल बीजेपी के खाते में हैं. इस सीट पर अब तक दो बार 2008 और 2013 में चुनाव हुए हैं जबकि अप्रैल 2017 में उप चुनाव हुए थे. इन तीनों चुनावों में यहां पर बीजेपी जीत हासिल करने में सफल रही है. यहां से फिलहाल बीजेपी के ज्ञान सिंह के बेटे शिवनारायण सिंह विधायक हैं. परिसीमन से पहले यह सीट कांग्रेस का गढ़ मानी जाती थी, 2006 के परिसीमन में क्षेत्र में थोड़ा बहुत बदलाव करते हुए इस विधानसभा का नाम बांधवगढ़ कर दिया गया. तब से ज्ञान सिंह 2008 और 2013 के चुनावों में लगातार जीतते रहे और 2017 के उपचुनाव में उनके बेटे शिवनारायण सिंह ने जीत दर्ज की. यहां कांग्रेस नेता सावित्री सिंह की आदिवासी वोट बैंक पर तगड़ी पकड़ मानी जाती है. मानपुर सीट से बीजेपी की मीना सिंह विधायक हैं. यहां 2013 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस तीसरे स्थान पर खिसक गयी थी जबकि निर्दलीय उम्मीदवार गायत्री सिंह दूसरे नंबर पर थीं. मीना सिंह ही यहां से 2008 में भी जीत चुकी हैं. कांग्रेस में उम्मीदवारी को लेकर इस बार भी यहां अंतर्कलह है और गायत्री सिंह की जगह बीजेपी से टूटकर आए जनपद पंचायत मानपुर के अध्यक्ष रामकिशोर चतुर्वेदी को टिकट दिए जाने की चर्चाएं हैं.

किसे सबक सिखाएंगे नाराज़ ‘ब्राह्मण’ ?
इन तीस सीटों में से 23 सीटें ऐसी हैं जहां ब्राह्मण आबादी 30% से भी ज्यादा है. ये देश का इकलौता ऐसा इलाका है जहां सवर्णों की आबादी 29% है और कुछ सीटों पर ये 45% तक भी है. विंध्य की दूसरी ख़ास बात ये है कि इलाके में एससी/एसटी की हिस्सेदारी भी 33% के आस-पास है. कांग्रेस नेता और रीवा से चुनाव लड़ चुके राजेंद्र शर्मा बताते हैं एससी/एसटी बंद अपने तरह का पहला था और इलाके के सवर्ण समाज में इसके बाद बेचैनी बढ़ गई थी. यहां की दस सीटों पर बसपा की मौजूदगी काफी मजबूत है इसके चलते बंद में भी काफी लोगों ने हिस्सा लिया था. राजेंद्र बताते हैं कि यहां सवर्ण खासकर ब्राह्मण तबका सिर्फ बीजेपी ही नहीं कांग्रेस का भी वोट बैंक रहा है. इसकी सीधी सी वजह दिग्गज कांग्रेसी नेता श्रीनिवास तिवारी को भी माना जा सकता है.

हालांकि मध्य प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मणों नेताओं का दबदबा आज़ादी के बाद से ही कायम रहा है. साल 1957 से 1967 तक कांग्रेस के आधे से ज़्यादा विधायक ऊंची जाति के होते थे और उनमें से भी 25 फ़ीसदी से ज़्यादा ब्राह्मण थे. वर्ष 1967 में 33 फ़ीसदी विधायक ब्राह्मण जाति से थे. सीनियर जर्नलिस्ट जयराम शुक्ल के मुताबिक श्यामा चरण शुक्ल जब 1969 में पहली बार मुख्यमंत्री बने थे तो उनके 40 मंत्रियों में से 23 ब्राह्मण थे. जयराम के मुताबिक 80 के दशक में तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने श्यामा चरण शुक्ल के क़द को छोटा करने के लिए मोतीलाल वोरा और सुरेश पचौरी जैसे ब्राह्मण नेताओं को आगे बढ़ाने की कोशिश की थी. 1985 में जब अर्जुन सिंह पंजाब के राज्यपाल बनाए गए तो वोरा को मुख्यमंत्री बना दिया गया.

हालांकि वोरा एक राजस्थानी ब्राह्मण थे जिनका मध्य प्रदेश में कोई बड़ा जनाधार नहीं था. अर्जुन सिंह ने ब्राह्मणों के राजनीतिक वर्चस्व को कम करने के लिए एक तरफ़ तो नए ब्राह्मण नेताओं को बढ़ावा दिया जिनमे श्रीनिवास तिवारी भी थे, जबकि दूसरी तरफ़ ठाकुरों और आदिवासी तथा पिछड़े वर्गों का राजनीतिक गठजोड़ बनाया. अर्जुन सिंह के इस क़दम को मुख्यमंत्री बनने के बाद दिग्विजय सिंह ने भी आगे बढ़ाया और इस तरह प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मण पिछड़ते चले गए. साल 2000 में छत्तीसगढ़ के मध्यप्रदेश से अलग राज्य बन जाने के कारण मोतीलाल वोरा और शुक्ल बंधु छत्तीसगढ़ चले गए जिसके कारण मध्यप्रदेश में ब्राह्मण नेताओं के दबदबे में और कमी आ गई.

उधर बीजेपी का कोर वोट बैंक और नेतृत्व का बड़ा हिस्सा भले ही सवर्ण हो लेकिन ब्राह्मण नेताओं के मामले में उसके पास भी कोई सर्वमान्य चेहरा नज़र नहीं आता. बीजेपी के पास पहले पूर्व सीएम कैलाश जोशी, पूर्व कैबिनेट मंत्री अनूप मिश्रा, लक्ष्मीकांत शर्मा और पूर्व सांसद रघुनंदन शर्मा जैसे प्रदेशव्यापी पहचान रखने वाले ब्राह्मण वर्ग के नेता थे, जो अब लगभग निष्क्रिय ही नज़र आते हैं. सरकार में भी छह ब्राह्मण मंत्री गोपाल भार्गव, नरोत्तम मिश्रा, अर्चना चिटनिस, राजेंद्र शुक्ल, दीपक जोशी, संजय पाठक हिस्सेदारी रखते हैं, लेकिन इनमें से एक भी ऐसा नहीं है जिसका अपनी सीट से बाहर के ब्राह्मण वोट बैंक पर कोई प्रभाव हो. सतना बीजेपी से जुड़े राम मिश्रा भी इस बात को मानते हैं लेकिन दावा भी करते हैं कि इसकी वजह है कि बीजेपी ने जाति आधारित राजनीति को किनारे करना शुरू कर दिया है.

क्या शिवराज को सबक सिखाएंगे ‘माई के लाल’
विंध्य से जो राजनीतिक संकेत मिलते हैं वो 2019 के लोसभा चुनावों के लिए बीजेपी की करवट लेती रणनीति की एक झलक भर है. सिर्फ विंध्य ही नहीं चंबल, ग्वालियर और बुंदेलखंड में भी बीजेपी सवर्ण आंदोलन और अपने कोर वोट बैंक को लेकर ज्यादा चिंतित दिखाई ही नहीं देती. इसके उलट स्थानीय स्तर पर वो एससी आबादी को जोड़ने के लिए काफी बेचैन दिखाई दे रही है. संघ से जुड़े रीवा के एक स्थानीय नेता ऑफ़ द रिकॉर्ड ये कहते भी हैं कि एससी/एसटी एक्ट को लेकर बीजेपी जो ऑर्डिनेंस लाई है उससे पहली नज़र में भले ही नुकसान दिखाई दे रहा हो लेकिन 2019 के नतीजों में इसका फायदा भी नज़र आएगा. वो सपष्ट कहते हैं कि एक वो तबका है जिसके 100 लोगों में से 60 लोग भी वोट नहीं करते और एक वो है जिसके 100 में से 85 लोग वोट करते हैं, ऐसे में आप ही बताइए कि 2019 में सरकार बनाने के लिए किसे टार्गेट करना ज्यादा फायदेमंद है ?

बहरहाल सतना सपाक्स से जुड़े रावेंद्र सिंह एमपी सरकार के प्रति काफी गुस्से में नज़र आते हैं. रावेंद्र का कहना है कि राज्य सरकार ने उन्हें ‘रोहिंग्या’ घोषित कर दिया है और कई बार कोशिश करने के बाद भी सरकार उनसे बात करने के लिए तैयार नहीं है. रावेंद्र का दावा है कि उनके पास सवर्णों के 52 संगठनों का समर्थन है और बीजेपी-कांग्रेस के विकल्प के रूप में लोग उनके कैंडिडेट को चुनेंगे. सतना के दलित नेता शंकर प्रजापति कहते हैं कि सवर्ण आंदोलन का नुकसान कांग्रेस-बीजेपी को होने वाला है जबकि इसके उलट एससी/एसटी भारत बंद के बाद बसपा की स्थिति इलाके में मजबूत हो गयी है. हालांकि सतना कांग्रेस के अध्यक्ष मक़सूद अहमद का मानना है कि सवर्ण आंदोलन के बाद इलाके में कांग्रेस की स्तिथि काफी मजबूत हो गयी है, वो दावा करते हैं कि बीजेपी से नाराज़ सवर्ण कांग्रेस के पास ही आएगा और राहुल गांधी की सभा में आई भीड़ इस बात की तस्दीक भी करती है. हालांकि इस बात में दम है कि बीजेपी नेताओं का सवर्ण आंदोलन के चलते इलाके में काफी विरोध हो रह है, इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि बीते दिनों रीवा में एक कार्यक्रम के दौरान विधायक राजेन शुक्ला बॉडीगार्ड साथ लेकर पहुंचे.

समस्याओं का क्या ?
इस जातीय दंगल में जो चीज़ सबसे पीछे छूटती नज़र आती है, वो है इलाके की समस्याएं. विंध्य की 30 सीटों पर ही अगर स्थानीय लोगों से बात करें तो पता चलता है कि बेरोज़गारी इलाके की सबसे बड़ी समस्या है. शहडोल, उमरिया और सिंगरौली के आदिवासी इलाकों में पलायन सबसे बड़ी समस्या है. यहां कई पावर प्लांट और खदाने हैं जो स्थानीय लोगों की ज़मीनों का अधिग्रहण करके ही बनाए गए हैं. नियम के मुताबिक कोई भी कंपनी रोज़गार नहीं देती, सिंगरौली में ग्रीनपीस एनजीओ ने आंदोलन भी चलाया और कोल ब्लॉक भी रद्द करवा दिया था लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. स्थानीय पत्रकार राज द्विवेदी बताते हैं कि ज्यादातर माइंस में कंपनियां दक्षिण भारत से सस्ते मजदूर ले आते हैं, और नियमों का खुलेआम उल्लंघन किया जाता है.

रीवा और सतना में भी स्थानीय लोगों से बात करने पर बेरोज़गारी ही सबसे बड़ा मुद्दा नज़र आता है. सतना के स्थानीय निवासी सुनील पांडे बताते हैं कि मुद्दा तो टूटी सड़कें और रोज़गार होना चाहिए था लेकिन जाति छोड़कर किसी और बारे में बात करने के लिए कोई तैयार ही नहीं है. अनूपपुर में भी बेरोज़गारी बड़ा मुद्दा है, स्थानीय पत्रकार राज नारायण बताते हैं कि बीजेपी के 15 सालों में कोई नई इंडस्ट्री इलाके में नहीं आई. सिर्फ एक मोजरवेयर का सीडी बनाने का प्लांट था वो भी अब बंद ही है. जिला अस्पताल बनने के लिए पैसा भी पास हो चुका है लेकिन ज़मीन ही नहीं खरीदी जा सकी है. रीवा में भी बदवार से सीतापुर की सड़क और रायपुर से मनिकवार रोड की हालत बेहद ख़राब है, साथ ही तमरादेश, जरहा, दुआरी और डढ़वा जैसे गांवों के लोग आज भी पीने के पानी के लिए 5 किलोमीटर जाने के लिए मजबूर हैं.





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