हिंदी न्यूज़ – OPINION: राहुल गांधी के लिए यूपी में गठबंधन की नाव पर सवार होना टेढ़ी खीर!_ BSP Supremo Mayawati gives clear indication that there is no way left for congress to join alliance in Uttar Pradesh Loksabha election 2019


बसपा सुप्रीमो मायावती ने बुधवार को जिस तरह से छत्तीसगढ़ के बाद मध्यप्रदेश और राजस्थान में अकेले चुनाव लड़ने की बात कही और गठबंधन न होने के लिए कांग्रेस को खरी खोटी सुनाई. इससे एक बात साफ है कि 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए यूपी में होने वाले गठबंधन में कांग्रेस के लिए जगह की गुंजाईश बहुत कम ही नजर आ रही है. हालांकि बसपा सुप्रीमो मायावती के बयान के बाद शुक्रवार को कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने इस बात का भरोसा जताया कि विधानसभा में गठबंधन नहीं हो सका है, लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में बसपा से गठबंधन होगा.

गठबंधन को लेकर मायवती और कांग्रेस के रुख पर न्यूज18 यूपी के एग्जीक्यूटिव एडिटर अमिताभ अग्निहोत्री का कहना है कि यूपी में बसपा की जो मौजूदा समय में रणनीतिक स्थिति है वह काफी मजबूत है. अगर बसपा को छोड़कर गठबंधन बनता है तो बीजेपी को हराना मुश्किल होगा. लिहाजा बसपा यूपी में गठबंधन की धुरी है. अगर उसके बिना सपा, रालोद और कांग्रेस गठबंधन करती भी है तो उसके कोई मायने नहीं हैं. यह बात मायवाती बखूबी जानती हैं और कांग्रेस को भी पता है.

अमिताभ अग्निहोत्री कहते हैं कि ‘मायावती की नाराजगी की वजह यह है कि वे लोकसभा चुनाव से पहले मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस से गठबंधन कर कुछ सीटें जीतना चाहती थी. ताकि लोकसभा चुनाव के समय बीजेपी और कांग्रेस के बाद सबसे बड़ी पार्टी बसपा रहे. लेकिन जिस सम्मानजनक सीट की बसपा बात कर रही थी उसे कांग्रेस ने दिया नहीं.’

उन्होंने कहा कि कांग्रेस की दोस्ती दो तरह की होती है. जब वह समर्थन लेती है तो उसका रुख अलग होता है और जब समर्थन देती है तो उसका अंदाज बदल जाता है. इसका उदहारण देखने को भी मिलता है. चंद्रशेखर, बीपी सिंह, एचडी देवेगौड़ा और इंद्रकुमार गुजराल सरकार को कांग्रेस ने समर्थन दिया और उन्हें बीच मझधार में डुबो भी दिया. लेकिन इसके उलट कांग्रेस ने सपा और बसपा के समर्थन से 10 साल की सरकार चलाई. नाराजगी के बावजूद सपा और बसपा ने समर्थन वापस नहीं लिया.इसके अलावा 2015 के बिहार चुनाव में जब गठबंधन हुआ तो उस वक्त कांग्रेस के पास चार विधायक थे. लेकिन उसे गठबंधन में 40 सीटें मिली और 27 पर जीत हासिल हुई. कांग्रेस की स्थिति 40 सीटों की नहीं थी, लेकिन फिर भी लालू और नीतीश ने उन्हें इतनी सीटें दी. ठीक इसी तरह मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भी बसपा सम्मानजनक सीट मांग रही थी. लेकिन कांग्रेस का कहना था कि इन राज्यों में पार्टी का जनाधार बहुत कम है. इतनी सीटें नहीं दे सकते. यहां कांग्रेस की रणनीति में साफ विरोधाभास नजर आता है.

अमिताभ अग्निहोत्री ने कहा, “जब खुद का दिल बड़ा करने की बात होती है तो कांग्रेस ऐसा नहीं करती. इसी बात को अखिलेश यादव ने भी कहा. अब मायावती का रुख स्पष्ट है. वह जानती हैं कि यूपी में गठबंधन तो सपा और बसपा के बीच ही है. अगर कांग्रेस शामिल होना चाहती है तो दो सीटों पर लड़ सकती है. क्योंकि यहां उसका वोट प्रतिशत 7 फीसदी है.”

“अब राहुल गांधी भले ही यह बात करें कि 2019 के लोकसभा चुनाव में बसपा से गठबंधन होगा तो यह एक सपना ही लगता है. क्योंकि मायावती 40 से 45 फ़ीसदी सीटों पर लड़ेंगी. बाकी की बची 40 से 35 सीटों में सपा जितना भी कांग्रेस को देना चाहे वह दे सकती. कहने का मतलब यह है कि कांग्रेस के लिए यूपी में बसपा एक भी सीट नहीं छोड़ने वाली. अगर सपा को छोड़नी है तो वह छोड़ सकती है. लेकिन मायावती अपना वोट कांग्रेस को ट्रान्सफर नहीं करवाएंगी.”

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