हिंदी न्यूज़ – Opinion on the Congress-BSP Coalition – कांग्रेस को बीएसपी का झटका


ये 2019 के लिए सबसे बड़ी घोषणा है कि बसपा –कांग्रेस के साथ मिलकर कभी चुनाव नहीं लड़ेगी. बसपा सुप्रीमो मायावती ने बहुत ही आक्रामक तेवर के साथ आरोप लगाया कि कांग्रेस अहंकार में डूबी अडियल पार्टी है. कांग्रेस की अकड़ के कारण मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ में बसपा –कांग्रेस एक साथ नहीं हो पाए हैं.

इस बार नहीं तो कभी नहीं

क्या कांग्रेस वाकई अकड़ में है ? राजनीतिक हालात बता रहे हैं कि ऐसा हरगिज नहीं है. मध्यप्रदेश में तो वो बसपा के लिए लाल कालीन बिछाए हुए थी. जो ठीक से अभी तक उठाया भी नहीं गया है. कांग्रेस यहां 15 साल से सत्ता से बेदखल है. इस बार नहीं तो कभी नहीं का जोश और दम भर कर वो मैदान में है. ऐसे हालात में उसका सबसे बड़ा सहारा बसपा ही थी. 2013 में बसपा का साढ़े छह फीसदी वोट बैंक उसके लिए खास मायने रखता था.

दोनों की मंज़िलें अलगमध्यप्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ के साथ मायावती लंबी मुलाकातें गेमचेंजर साबित होने वाली थीं. लेकिन एक पखवाड़े पहले टेबल पूरी तरह से घूम गई. कांग्रेस बसपा में सहारा ढूंढ़ रही थी, लेकिन बसपा कांग्रेस के दम पर अपना जनाधार बढ़ाना चाहती थी. दोनों की मंजिलें और मकसद अलग-अलग थे. एक को जीत के लिए सहारा चाहिए था तो दूसरे को अपनी ज़मीनी ताकत बढ़ानी थी.

सिमटती बसपा

पिछले दस साल से बसपा का देश भर में 8 प्रतिशत वोटबैंक टूटा है. 2014 की मोदी लहर में बसपा का खाता तक नहीं खुल पाया था. संसद में बसपा का एक भी सांसद नहीं होना मायावती को भारी पड़ रहा है. देश की 20 प्रतिशत दलित राजनीति में बसपा का हिस्सा सिमटता जा रहा है. मायावती कांग्रेस के साथ हर राज्य में हर चुनाव में सम्मानजनक गठबंधन चाहती थी. कर्नाटक में कांग्रेस के साथ अपने खराब अनुभव को वह भूली नहीं है.

कर्नाटक मॉडल

कांग्रेस – बसपा के इस खराब रिश्ते में कर्नाटक चुनाव भी पृष्ठभूमि में हैं. यहां कांग्रेस सिध्दारमैया की वापसी की उम्मीद में अपनी अकड़ में रही. उसने ना तो जेडीएस ना ही बसपा को तवज्जों दी. बसपा ने वहां जेडीएस का साथ लेकर ज़बर्दस्त एंट्री मारते हुए अपना जनाधार बढ़ा लिया है. उसका उदाहरण हाल ही में हुए स्थानीय निकाय चुनाव हैं. वहां बसपा को 13 सीटें हासिल हुई हैं. कांग्रेस इसी कर्नाटक मॉडल से आशंकित थी. उसे पता था कि एक हद से ज्यादा बसपा को तवज्जों देना याने अपने जनाधार को खत्म करना है. जिस तरह यूपी में कांग्रेस तीसरे –चौथे नबंर की पार्टी बन गई है.

सीटों के बंटवारे पर टूटा मामला

कांग्रेस मध्यप्रदेश,छत्तीसगढ़ में कुछ शर्तों के साथ समझौते के लिए तैयार थी. राजस्थान में अपनी मज़बूती को देखते हुए उसे बसपा का साथ मंजूर नहीं था. कई स्तर पर चर्चा होने के बाद कांग्रेस को उम्मीद थी कि बहनजी मान जाएंगी. लेकिन ऐसा नहीं हो पाया. मध्यप्रदेश में तकनीकी तौर पर सीटों के बंटवारे को लेकर बात रुक गई. बसपा विंध्य और चंबल क्षेत्र की 40 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारना चाहती थी. और कांग्रेस उसे 10  या 12 सीटों से ज्यादा देने को तैयार नहीं थी.

सिंधिया और अजयसिंह का गढ़

जिस विंध्य और चंबल में बसपा सीटें चाहती थी वो सीधे सीधे ज्योतिरादित्य सिंधिया और दिवंगत नेता अर्जुन सिंह और अजय सिंह के गढ़ माने जाने वाले इलाके हैं. यहां पर बसपा की एंट्री का मतलब कांग्रेस को कई तरह का सीधा नुकसान. उसके सुरक्षित लोकसभा क्षेत्रों के गढ़ का ढहना तय था. दूसरा सवर्ण और दलित राजनीति के गढ़ माने जाने वाले ये इलाके पूरी तरह बंट जाते. इसका असर कांग्रेस की सवर्ण सीटों पर भी होता.

सॉफ्ट हिंदुत्व में रोड़ा

कांग्रेस का एक वरिष्ठ खेमा यह भी मानता है कि पूरा मध्यप्रदेश सवर्ण और एससी एसटी एक्ट की राजनीति में उलझ रहा है. ऐसे में बसपा का साथ होना याने उस 36 प्रतिशत वोट बैंक को नुकसान पहुंचाना है जो कांग्रेस को पिछले चुनाव में हासिल हुए थे. सॉफ्ट हिंदुत्व के दम पर सवर्णों की राजनीति को साधने में लगी कांग्रेस, बसपा के नाम पर कोई बड़ा जोखिम लेने को तैयार नहीं थी.

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